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Last Bus Passenger

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आखिरी बस का यात्री

रात के करीब 12:40 बजे रवि आखिरी बस से अपने गांव लौट रहा था।

बस लगभग खाली थी। ड्राइवर, कंडक्टर और रवि के अलावा सिर्फ एक बूढ़ा आदमी पीछे की सीट पर बैठा था।

बस जैसे ही पुराने जंगल वाले रास्ते पर पहुंची, अचानक उसकी सारी लाइटें बंद हो गईं।

कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आई।

रवि ने खिड़की से बाहर देखा।

सड़क के किनारे एक लड़की सफेद कपड़ों में खड़ी थी।

उसने हाथ उठाकर बस रोकने का इशारा किया।

रवि ने ड्राइवर से कहा,
“भैया, इसे भी बैठा लो।”

ड्राइवर ने बिना बाहर देखे कहा,
“इस रास्ते पर रात में कोई नहीं मिलता।”

रवि ने दोबारा खिड़की से देखा।

वह लड़की वहां नहीं थी।

बस आगे बढ़ती रही।

करीब दस मिनट बाद कंडक्टर रवि के पास आया और बोला,
“भाई साहब, आपका टिकट?”

रवि ने टिकट दिखाया।

कंडक्टर ने टिकट देखते ही उसका चेहरा बदल लिया।

“ये टिकट आपको किसने दिया?”

रवि ने कहा,
“आपने ही तो दिया था।”

कंडक्टर कुछ बोलता, उससे पहले पीछे बैठे बूढ़े आदमी ने धीमी आवाज में कहा—

“इसे मत बताना... वरना ये अगली बस तक नहीं पहुंचेगा।”

रवि ने घबराकर पीछे देखा।

बूढ़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।

लेकिन उसकी आंखें...

बिल्कुल सफेद थीं।

रवि तुरंत अपनी सीट से उठकर ड्राइवर के पास चला गया।

“बस रोको!”

ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

रवि ने उसका कंधा हिलाया।

ड्राइवर का सिर धीरे-धीरे पीछे घूमने लगा।

लेकिन उसका चेहरा ड्राइवर जैसा नहीं था।

वही सफेद आंखें।

वही डरावनी मुस्कान।

और फिर पीछे से लड़की की आवाज आई—

“मुझे भी अपने गांव जाना है...”

रवि ने पीछे देखा।

वही लड़की उसके ठीक पीछे खड़ी थी।

उसके पैर जमीन पर नहीं थे।

वह हवा में कुछ इंच ऊपर तैर रही थी।

रवि चीख पड़ा।

अचानक बस जोर से ब्रेक लगाकर रुक गई।

सुबह के करीब 5 बजे गांव के लोगों ने सड़क किनारे एक बस खड़ी देखी।

बस बिल्कुल खाली थी।

ड्राइवर और कंडक्टर दोनों गायब थे।

पीछे की सीट पर सिर्फ रवि बैठा था।

उसकी आंखें खुली थीं।

लेकिन वह किसी को पहचान नहीं रहा था।

लोगों ने उसे बस से बाहर निकाला।

तभी एक बूढ़े आदमी ने बस की आखिरी सीट की तरफ इशारा किया।

वहां एक पुराना टिकट पड़ा था।

टिकट पर तारीख लिखी थी—

16 अगस्त 2006

और नीचे यात्री का नाम था—

रवि।

सबसे डरावनी बात यह थी कि...

रवि का जन्म 2007 में हुआ था।

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